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लक्ष्मी बाई के प्रति (तीन रुबाइयां)





लक्ष्मी बाई के प्रति (तीन रुबाइयां) 
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आफ़ताब थी कभी वो माहताब थी,  
थी बर्फ़ मगर जलती हुई आग थी! 
तलवार से वह खिंचती शराब थी ;
कोई बताए हक़ीक़त थी या ख़्वाब थी!! 

रेगिस्तां थी वो दरिया थी वो सुराब थी, 
घेर ले जो आसमान को सहाब थी! 
शिकश्त खा के भी सौ बार कामयाब थी;
झांसी की वो चढ़ती हुई शबाब थी!! 

अपने - आप में वह एक इन्क़लाब थी, 
हर सवाल का सीधा- सा एक जवाब थी! 
शोला थी वो शबनम थी लाजवाब थी ;
दरअसल हिन्द के हाथों की वह किताब थी!! 
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सुराब = मृगतृष्णा
सहाब = बादल और बिजली
© वी. पी. सिंह

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14 Comments

Suryansh

07-Nov-2022 06:46 PM

Wahhh बहुत ही उम्दा

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Virendra Pratap Singh

10-Nov-2022 05:04 AM

Thanks for likening and comment Pooja Jee.

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बहुत ही उम्दा सृजन और अभिव्यक्ति एकदम उत्कृष्ठ

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Virendra Pratap Singh

05-Nov-2022 09:27 PM

बहुत और बहुत बहुत धन्यवाद शशांक जी.

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Gunjan Kamal

05-Nov-2022 12:07 AM

बहुत सुंदर

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Virendra Pratap Singh

05-Nov-2022 09:28 PM

आत्मीय आभार गुंजन जी.

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